maheshwar sutra in sanskrit
Type Here to Get Search Results !

maheshwar sutra in sanskrit

संस्कृत माहेश्वर सूत्र

माहेश्वर सूत्र

जो एक और मात्र एक ध्वनि को असंदिग्ध रूप से निरूपित करे । (आज यह देवनागरी है जो कदाचित् किसी मूल – ब्राह्मी अथवा उससे भी पूर्ववर्ती
लिपि के निरंतर परिवर्तन के बाद अंततः प्रतिष्ठित लिपि है ।) इस भाषा का व्याकरण उसकी ध्वनियों को केंद्र में रखते हुए विकसित हुआ है । संस्कृत का मान्य व्याकरण महर्षि पाणिनि के सूत्रबद्ध नियमों पर आधारित है । इन सूत्रों में व्याकरण की सभी बारीकियां संक्षिप्त रूप से निहित हैं । विभिन्न स्वर एवं व्यंजन ध्वनियों को सूत्रों में संक्षिप्त तौर पर इंगित करने के लिए  महर्षि पाणिनि ने इन ध्वनियों को वर्गीकृत करते हुए 14 मौलिक सूत्रों की रचना की है, जिन्हें ‘माहेश्वर सूत्र’ कहा गया है । इन्हें अधोलिखित तालिका में संकलित किया गया है:
only hindi gk
इन सूत्रों के बारे में यह कथा प्रचलित है कि महर्षि पाणिनि को इनका ज्ञान भगवान् महेश्वर (शिव) से प्राप्त हुआ था । महर्षि के सम्मुख महादेव ने नृत्य किया जिसके समापन के समय उनके डमरू से उपरिलिखित सूत्रों की ध्वनि निकली और वे ही उनके द्वारा प्रस्तुत सूत्रबद्ध संस्कृत व्याकरण का आधार बने । इस बारे में यह श्लोक प्रचलित हैः

maheshwar sutra in sanskrit

नृत्यावसाने नटराजराजो ननाद ढक्कां नवपञ्चवारम् ।
उद्धर्तुकामः सनकादिसिद्धानेतद्विमर्शे शिवसूत्रजालम् ॥
(सनक आदि ऋषियों के भले के लिए नर्तक-शिरोमणि ‘नटराज’ ने डमरू को नौ+पांच बार बजाया जिससे शिवसूत्र-समुच्चय  उपलब्ध हुआ ।)
 
इन 14 सूत्रों के अंत में क्रमशः विद्यमान् ‘ण्, क्, ङ्, …’ को ‘इत्’ कहा जाता है । ये स्वयं उन ध्वनियों में शामिल नहीं रहते, जिनको से सूत्र इंगित करते हैं । इस प्रकार ‘अइउण्’ तीन स्वर ध्वनियों – ‘अ’, ‘इ’ एवं ‘उ’ के लिए प्रयुक्त सामूहिक संकेत है । इत् का भी अवश्य कुछ महत्त्व है ।
ध्यान दें कि उक्त तालिका की पहली पंक्ति में स्वर ध्वनियां हैं, जब कि
शेष तीन में व्यंजन ध्वनियां सूत्रबद्ध हैं । चूंकि व्यंजनों का स्वतंत्र तथा शुद्ध उच्चारण असंभव-सा होता है, अतः इन सूत्रों में वे स्वर ‘अ’ से संयोजित रूप में लिखे गये हैं । ताकि उन्हें सरलता से बोला जा सके । किंतु सूत्रों का प्रयोजन वस्तुतः व्यंजनों के शुद्ध उच्चारण को दर्शाना है । उदाहरणार्थ ‘हयवरट्’ वास्तव में क्रमशः ‘ह्’, ‘य्’, ‘व्’ एवं ‘र्’ की सम्मिलित ध्वनियों का द्योतक है । (यानी ‘अ’ की ध्वनियों तथा इत् ‘ट्’ हटाकर जो बचता है ।)यदि इन सूत्रों में मौजूद ‘इतों’ को हटा दिया जाए और शेष वर्णों को यथाक्रम लिखा जाए तो हमें वर्णों की आगे प्रस्तुत की गई तालिका मिलती है ।

महर्षि पाणिनि के माहेश्वर सूत्र

onlyhindigk.blogspot.in
माहेश्वर सूत्र
इस तालिका में वर्णों का क्रम ठीक वही नहीं है, जिसे (जिस वर्णमाला को) भाषा सीखने के आरंभ में पढ़ा जाता है । लेकिन इन सूत्रों में निहित क्रम निराधार अथवा यादृच्छिक (random) नहीं हैं । उन्हें ध्वनियों के उच्चारण संबंधी किंचित् समानताओं के आधार पर समुच्चयों में निबद्ध लिखा गया है । उदाहरणार्थ (एक पंक्ति में लिखित) ‘ञ म ङ ण न’, सभी, अनुनासिक (nasal) हैं, जब कि (एक स्तंभ, column में लिखित) ‘ञ झ ज छ च’, सभी तालव्य हैं । यह असल में विपरीत क्रम में लिखित वर्णमाला का ‘चवर्ग’ है । संस्कृत भाषा की विशिष्टता यह है कि इसमें वही ध्वनियां शामिल हैं जिनको परस्पर समानता एवं विषमता के आधार वर्गीकृत किया जा सके । इस प्रकार का अनूठा वर्गीकरण विश्व की किसी भी अन्य भाषा में कदाचित् नहीं है । ध्यान दें कि माहेश्वर सूत्रों के उच्चारण में जो ध्वनियां बोली जाती हैं, लिपिबद्ध निरूपण में विभिन्न ‘वर्ण’ उनके ही संकेतों के तौर पर लिखे गये हैं ।
ऊपर चर्चा में आया ‘इत्’ सूत्रों के उच्चारण में सहायक होता है । इसके अतिरिक्त यह एक या अधिक ध्वनियों के क्रमबद्ध समुच्चय को संक्षेप में दर्शाने में अहम भूमिका निभाता है । यह योजना काफी रोचक एवं वैज्ञानिक है । सूत्रों की क्रमिकता को बनाये रखते हुए कोई एक ध्वनि और उसके पश्चात् के किसी इत् को मिलाकर संक्षिप्त सूत्र की रचना की जा सकती है जो उन समस्त ध्वनियों को इंगित करता है जो अमुक ध्वनि से अमुक इत् के पूर्व तक हों । दृष्टांत ये हैं:
अण् = अ, इ, उ; इण् = इ, उ; इक् = इ, उ, ऋ, ऌ,;

अच् = अ, इ, उ, ऋ, ऌ, ए, ओ, ऐ, औ; (सभी स्वर)

यण् = य, व, र, ल; झञ् = झ, भ; झष् = झ, भ, घ, ढ, ध;

चय् = च, ट, त, क, प; इत्यादि
इसी संदर्भ में ‘हल्’ का उल्लेख समीचीन होगा । ‘ह’ प्रथम व्यंजन सूत्र (हयवरट्) में है और साथ ही अंतिम सूत्र (हल्) में भी – दो बार उल्लिखित । जब भी ‘हलन्त’ शब्दों की चर्चा की जाती है तो उसका मतलब होता है कि उनके अंत में स्वरविहीन व्यंजनों (क्, ख्, ग् … ) में से कोई एक मौजूद रहता है । अर्थात् शब्द का अंत ‘हल्’ से होता है । यहां पर ‘हल्’ उक्त माहेश्वर सूत्रों के प्रथम ‘ह’ से लेकर बाद के समस्त व्यंजनों को सामूहिक रूप से इंगित करता है । दूसरी तरफ अंतिम सूत्र के अनुसार ‘हल्’ अकेले ‘ह’ को भी व्यक्त कर सकता है । स्पष्ट है कि ‘हल्’ का कब क्या अर्थ स्वीकार्य होगा यह प्रसंग पर निर्भर करेगा ।
स्वरों के संदर्भ में यह भी ज्ञातव्य है कि ‘अक्’ से इंगित सभी स्वर (अ, इ, उ, ऋ, ऌ,) ह्रस्व अथवा दीर्घ, दोनों प्रकार से, प्रयुक्त होते हैं । पाणिनि व्याकरण में ह्रस्व/दीर्घ का यथोचित उल्लेख किया जाता है, किंतु दोनों को एक ही लिपिचिह्न से व्यक्त किया है । अन्य स्वर (ए, ओ, ऐ, औ) केवल दीर्घ होते हैं । संस्कृत में ‘प्लुत’ का भी प्राविधान है । जब स्वरोच्चारण को अतिरिक्त लंबा खींचा जाता है, जैसा कि संगीत में होता है, तब उन्हें प्लुत कहा जाता है । आम तौर उन्हें व्याकरण के नियमों से मुक्त रखा गया है ।

अंत में इतना और कि स्वरों-व्यंजनों के अलावा संस्कृत में दो विशिष्ट घ्वनियों का भी भरपूर प्रयोग होता है । ये हैं अनुस्वार (वर्णों के ऊपर लिखित बिंदी) और विसर्ग (स्वरों एवं स्वरमात्रा-युक्त व्यंजनों के दायें बगल लिखित कोलन-सदृश,:, चिह्न) । इनसे संबद्ध घ्वनियां क्या हैं और कैसे पैदा होती हैं इन सवालों का उत्तर घ्वनियों के उच्चारण संबंधी प्रयत्नों की व्यापक चर्चा के समय मिल सकता है । यह चर्चा अन्यत्र की जाएगी । 
ये भी पढ़ें-

Sandhi in Sanskrit

 शनि चालीसा हिंदी में

यदि मेरा ब्लॉग पसंद आया होतो तो कृपया अपने मित्रो को शेयर  करना न भूलें

Post a Comment

0 Comments
* Please Don't Spam Here. All the Comments are Reviewed by Admin.

Ads Area